भैया चुनाव आ रहा है। ( हमरी कलम से)

सुबह सुबह टेहलने निकले तो दिखा अजब नज़ारा,
सदियों बाद साफ सुथरा दिखा हमें मुहल्ला हमारा।

मिजाजे सड़क का था अजब सा चेहरा,

हर चौराहे पे था पुलिस का पेहरा।

कुछ एक रंग के झंडो से, सजा था शहेर हमारा,

कोने में पड़ा कूडादान, मायूस खड़ा था बेचारा।


रातों रात नई सड़क देख मन अचंभित हुआ हमारा,

आज तो मुन्नू कि चाय का रंग देख मुस्कुरा उठा ये चेहरा।


कौतुहल में सवाल उठा, कोई आ रहा है?

मिश्रा जी थपाक से बोले, भईया चुनाव आ रहा है।



अख़बारों की सुर्खियों में खबरें कम, विज्ञापन थे ज्यादा,

हर पार्टी ने पन्नों का किया बटवारा आधा आधा।


पत्रकारों की पत्रकारिता में मुद्दे कम अनुमान थे ज़्यादा,

और लिए एजेंडा घूम रहे थे ये सब नेताओं से ज़्यादा।


जब लोग यहां दिखने लगे कुर्ते पयजामे में ज्यादा,
और हर तरफ जब सुनाई दे वादा ही वादा।

तो बिना सोचे समझ लेना, जो न समझे समझा देना।

की भाईया चुनाव आ रहा है।



जब खबरों में दिखने वाले चेहरे साखशात सामने नजर आएं,

और जबरदस्ती हाथ जोड़ कर आपके सामने मुस्कुराए,


जब भूले बिसरे मुद्दे फिर जी उठ जाए,
और एक दुसरे पे आरोपों कि वो लडी लगाए।

जब अपने अपने धर्म की रक्षा में चिंतित कुछ लोग नजर आएं,

और आपको अपनी जाति धर्म का फिर से ज्ञान हो जाए।


तब हस्ते हस्ते खुद से केहना,

की भैया चुनाव आ रहा है।


धन्यवाद,

उत्कर्ष श्रीवास्तव।

© UTKARSH SRIVASTAVA

© Sankshep-The summary 2019

2 thoughts on “भैया चुनाव आ रहा है। ( हमरी कलम से)

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