संभावना, निष्कर्ष और निर्णय:-

संभावना, निष्कर्ष और निर्णय:-

तीन अलग अलग शब्द और तीनों के अलग अलग महत्व।
तो आज इन शब्दों से क्या सीखने और समझने वाले हैं हम?

कुछ दिलचस्प ही है जो कि हर व्यक्ति विशेष से जुड़ा हुआ है।

कैसे किसी भी इंसान को हम गलत  का दर्जा देते हैं?

उसकी किसी भी बात को जो कि उसके द्वारा कही गई हो, या हमने उस इंसान की वो बात किसी और के द्वारा सुनी हो को हम सर्वप्रथम एक संभावना या सम्भावित दृष्टि से देखते हैं फिर एक आकलन कर उसी बात का निष्कर्ष निकालते हैं और फिर अंततः निर्णय ले लेते हैं कि वो इंसान गलत है। हाँ है गलत। क्यूँ कि मैंने अब निर्णय ले लिया है। ये निर्णय अब अटल है और आजीवन रहेगा।

फिर से शुरू करें?

संभावना, निष्कर्ष और निर्णय!


संभावना, से शुरू हुआ कोई सिलसिला निष्कर्ष तक तो ठीक है पर संभावना जिस बात का आधार हो ,सिर्फ संभावना,  उस आधार पर लिया गया निर्णय क्या हमेशा सही हो सकता है?

संभावना में वास्तविकता कितनी है की जानकारी किए बिना आपका निष्कर्ष और फिर निर्णय तक पहुँचना असंभव है । क्यों कि संभावना में वास्तविकता का सही ज्ञान ही सही निर्णय लेने में अहम भूमिका निभा सकता है।

गहराई से सोचिए क्या जल्दबाजी अच्छी बात है निर्णय लेने के लिए?
क्या एक संभावना जिसमें शायद ही कोई बात सच हो?
या कुछ बातें सच और कुछ गलत भी हो?
तो क्या ऐसे तथ्यों को आधार बनाया जाना चाहिए निर्णय लेने के लिए?
ऐसे निर्णय जिनसे आपके रिश्ते बन या बिगड़ सकते हैं, हमेशा के लिए ?



मेरी कलम, मेरे विचार
सुमित

Article by Sumit kumar
©Copyright reserved Sankshep-The Summary 2021

©Copyright reserved Sumit kumar

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